उनकी डायरी के कुछ पन्ने
मैं उनकीं डायरी के कुछ पन्ने पढ़े जा रहा था| और इस बात से अनजान था कि मैं यूँ पढ़ते हुए उनकी निज़ी ज़िंदगी को अपने माँ बापू के सामने उज़ागर कर रहा था| जब भी वो पल याद आते है तो खुद को कोसता रहता हू|
वो भी मेरी तरह अपनी डायरी मे कुछ लिखा करती थी, उनकी कुछ परेशानिया , रोज़मर्रा की तकलीफे, और वैवाहिक ज़ीवन से जुड़े ज़ुल्म| मैं उस समय उनके दर्द को समझ नही पा रहा था| पर आज सब कुछ समझ मे तो आ गया है लेकिन इतनी हिम्मत नही जुटा पाया की उनसे माफी माँग सकु| सोचता हू की एक दिन उनकी तकलीफे दूर करूँगा फिर उनसे अपने किए की माफी भी माँग लूँगा| लेकिन उनके दुख तो बढ़ते चले गये है और मैं उनकी कभी मदद नही कर पाया| मैं उस समय तो ना समझ था , लेकिन आज जानते हुए भी कुछ नही कर पा रहा हू, या तो मैं कायर हू या फिर मैं उनके दुखों को नकार रहा हू|
आज जब भी घर जाता हू तो उनकी कोई लिखी हुई डायरी ढूंढता रहता हू, इसलिए नही की मैं उन्हे पढ़ना चाहता हूँ बल्कि इसलिए की देखना चाहता हू उनके दुख और कितने पन्नों और कितनी डायरियो मे समाएँगे| मगर मुझें कुछ नही मिलता है,,यहा तक की उनका लिखा हुवा एक पन्ना भी नही मिलता हैं| क्या उनके दुख दूर हो गये? नही, उनके दुख तो और भी ज़्यादा बढ़ते चले गये हैं | फिर एसा क्या हुवा की उन्होने लिखना ही छोड़ दिया| इन सवालो के जवाब तो केवल उन्ही के पास है, और इनके जवाब तब ही मिलेंगे जब मैं उनसे अपने किए की माफी माँग लूँगा| और माफी भी तब ही माँगूंगा जब उनके दुख दर्द दूर कर दूँगा|
घरेलु हिंसा जैसी चीज़े हमारे समाज मे आम बात सी हो गई है, हर दूसरे तीसरे घर मे महिला अपने आँसू पोंछते हुए मिल ही जाएगी, मगर उनके आँसू दूर करने वाले नही मिलेंगे| अभी मैंने हार नही मानी है ना ही उन्होने हार मानी है, वो भी झुंझ रही है और मैं भी झुंझ रहा हू| उनके अच्छे दिन जल्द ही आएँगे|
P.S. : This is a fictional work

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